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गरीब मज़दूर भी स्टेक होल्डर है इस देश का फिर इनके हिस्से इतनी दर्दनाक तकलीफें क्यों?

May
16 2020

विनय द्विवेदी

देश के हर हाइवे की स्थिति ये बता रही है कि हमारा इंसानी समाज लोगों की मदद के लिए मोर्चे पर है और सरकार जिसकी जिम्मेदारी है वो लगभग गायब है. देश भर के रास्तों पर भटकते गरीब भारतीयों में राम भी हैं और रहीम भी और इनकी मदद के लिए कोरोना के संक्रमण का खतरा उठाये खड़े लोगों में भी राम और रहीम दोनों हैं. तो फिर क्या न्यूज़ चैनलों के द्वारा बोये गए सांप्रदायिक ज़हर का असर ख़त्म हो गया है या हुआ ही नहीं है?

प्रवासी गरीबों की तकलीफें हमारी संवेदनशील कल्पनाओं से परे हैं. देश का हर महत्वपूर्ण रास्ता इनकी तकलीफों की दास्तान लिए खड़ा है. इन रास्तों पर चल रहे लोगों को घर का रास्ता तो रास्ते में मिलते लोगों से पूछ कर पता चल जाता है लेकिन इनकी जिंदगी का आगे का रास्ता होगा क्या इन्हें नहीं मालूम है. इन भटकते गरीबों में से बहुतों को तो ये भी पता नहीं होगा कि इनके नाम पर पिछले कई दिनों से हो रही सरकारी पैकेजों की घोषणाओं में इनके हिस्से आया क्या है? आने वाले समय में भी इनमें से बहुतों को मरते दम तक इनके हिस्से की जानकारी शायद नहीं होगी.

हमारी तरह ये गरीब भी देश के स्टेक होल्डर्स हैं. लेकिन फर्क देखिये, व्यवस्था का भेदभाव ये है कि हमारी तरह इनडाइरेक्ट टैक्स गरीब भी देते हैं लेकिन इनकी संख्याबल के हिसाब से सुनवाई नहीं होती. इन्हें सिर्फ चुनाव में वोट देने के वक्त सुनाया जाता है थोड़ा बहुत सुन भी लिया जाता है लेकिन इसके बाद इनके साथ ताजिंदगी वही होता है जो अभी हो रहा है. बस इसका रूप-स्वरुप अलहदा होता है. सड़कों, रेल की पटरियों और पगडंडियों पर इन गरीब स्टेक होल्डर्स को भला क्यों भटकने दिया जाना चाहिए क्या इस देश को बनाने और आगे बढ़ाने में इनकी कोई हिस्सेदारी नहीं है. और जब ये स्टेक होल्डर्स हैं तो फिर इनके हिस्से सिर्फ तकलीफें क्यों?

दरअसल ये जो गरीब भारतीय हैं ना इनके पास आई टी सेल नहीं है और ना ही इन्हें झूठ बोलना आता है. इनके पास बताने और दिखाने के लिए बहुत कुछ है. इनके दुःख, दर्द, मुश्किलें और तकलीफें इतनी हैं कि अखबारों के पेज कम पड़ जाएंगे, चौबीसों घंटे के चैनलों को समय कम पड़ जाएगा और सोशल मीडिया कंपनियों के सर्वर इनकी तकलीफों के बोझ से डाउन हो जाएंगे. खबरनबीसों की उंगलियां इनकी तकलीफों को लिखते लिखते अकड़ जाएंगी फिर भी गरीबों की तकलीफें कम नहीं होंगी. इसीलिए भारतीय मीडिया के बड़े हिस्से में इनकी ख़बरें देखने और पढ़ने को नहीं मिलती. मीडिया को पता है अगर गरीब एजेंडे पर आ गया तो सत्ता के ध्वस्त होते देर नहीं लगेगी.

बड़ा सवाल फिर से सरकार पर ही खड़ा होता है कि क्या सरकार के एजेंडे में गरीब है? अगर होता तो क्या रास्तों पर हजारों किलोमीटर पैदल भटकते गरीब लोग? विश्व गुरु बनने के सपने देखने वाला देश भला कुछ करोड़ लोगों को कुछ महीनों तक रोटी पानी नहीं दे सकता? अगर इनको हमारे देश की सरकार रोटी नहीं दे सकती तो किसी तरह इनके घरों तक भी नहीं पहुंचा सकती? और अब जब स्थितियां बेहद अमानवीय हो चुकी हैं तब सरकारें घोषणावीर बनी हुई हैं. आप किसी भी हाइवे पर निकल जाइये गरीबों की भीड़ कहीं पैदल तो कहीं किसी वाहन से अपने घरों की और जाती दिख जायेगी. इसमें बहुत छोटे बच्चे, बुजुर्ग और गर्भवती महिलायें हैं. हर रोज किसी ना किसी वजह से इनमें से कई लोगों की मौत की ख़बरें सुर्खियां बन रही हैं. इन सबकी एक ही तकलीफ है भूख, जिसके लिए गाँव से शहर गए और अब शहर से गाँव को वापस जाना पड़ रहा है. इन्हें गाँव में क्या और कितना रोजगार मिलेगा ये एक अलग सवाल है.

रास्तों पर भटकते इन्हीं गरीबों की मदद के लिए हर रास्ते पर चाहे वो शहर का वाईपास हो या गाँव से गुजरने वाला हाइवे, मानवीय संवेदनाओं से लबालब भरे लोग आपको मिल जाएंगे. इनमें हर धर्म और जाति से जुड़े लोग है जो गरीबों को खाने से लेकर जूते चप्पल और दवाइयों की व्यवस्था कर रहे हैं. इन मददगार लोगों को नहीं पता कि जिस गरीब की वो मदद कर रहे हैं वो कोरोना संक्रमित है या नहीं, लेकिन फिर भी जिंदगी दांव पर लगाए लाखों लोग सेवा में लगे हुए हैं. इस सब में सरकार की ओर से इन गरीबों के लिए नाकाफी व्यवस्थाएं हैं बस घोषणाएं बड़ी हैं.

सकारात्मक और राहत देने वाली बात ये है कि जो लोग राहत काम में लगे हैं और जिन गरीबों को राहत मिल रही है उनमें से कोई भी किसी का मज़हब या जाति नहीं पूछ रहा. इसीलिए तो कहा जाता है कि भूख-प्यास को धर्म-जाति का अभी तक पता नहीं चला है इसलिए इस दौर में सड़कों पर भटकता गरीब भूख से कम ही मर रहा है. अगर मीडिया के बोये साम्प्रदायिक ज़हर ने अपना असली रूप दिखाया होता तो हमारे देश की सड़कें, रेल पटरियां खाली पेट लाशें उगल रहे होते और फिर खबर भूख से मरे लोगों की लाशें नहीं पोस्टमार्टम में किसी गरीब के पेट में मिले दाने होती. इसका मतलब ये बिलकुल नहीं है कि सांप्रदायिक राजनीति और इसकी दलाल मीडिया के बोये ज़हर का असर नहीं हुआ है. इसके असर के परिणाम को देखने के लिए 2024 के आम चुनाव तक इंतज़ार करना ही होगा.

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विनय द्विवेदी

लेखक www.kharinews.com के मुख्य संपादक हैं।

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