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इस एक सोशल प्लैटफॉर्म ने कर दिया युवा भारत को एकजुट

Dec
20 2019

पहली बार छात्र आंदोलन में बीजेपी के आईटी सेल को मिली करारी हार

भोपाल से सौमित्र रॉय की रिपोर्ट 

अब तक उनकी बारी थी, अब हमारी बारी है। कॉलेज में बीएसएसी फर्स्ट ईयर की छात्रा इशरत सोशल मीडिया की बात कर रही हैं। बात भारत के नागरिकता संशोधन कानून की भी है और देश की धर्मनिरपेक्ष छवि को तार-तार करने के नापाक मंसूबों की भी। इशरत के हाथ में एक तख्ती है, जिस पर लिखा है- ‘यह देश हमारा है, तुम्हारे बाप का नहीं है’। तरन्नुम के हाथ में एक बड़ी सी तख्ती है, जिस पर संविधान की प्रस्तावना लिखी है। ऐसा नहीं कि ये तख्तियां केवल मुस्लिमों के ही हाथ नजर आती हैं। तादाद में उनसे तीन गुनी संख्या में नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने आए बहुसंख्यक हिंदुओं में भी इतना ही गुस्सा है।

असम से लेकर अहमादाबाद और दिल्ली से लेकर त्रिवेंद्रम तक लाखों लोग इसी तरह हाथों में तख्तियां लिए केंद्र की मोदी सरकार के नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) का सड़कों पर, विश्वविद्यालयों में और जहां जगह मिले विरोध कर रहे हैं। आजादी के बाद की तीसरी पीढ़ी को देश के संविधान की रक्षा के लिए सड़कों पर देखकर दूसरी पीढ़ी को जेपी आंदोलन याद आ रहा है तो पहली पीढ़ी की आंखों में आजादी के संग्राम का नजारा तैरने लगा है। लेकिन इन सबके बीच जो परदे के पीछे दिन-रात सक्रिय है, वह सोशल मीडिया है। जिस तरह से अरब क्रांति में ट्विटर ने प्रमुख भूमिका निभाई थी, ठीक उसी तरह जामिया में पुलिस की जबरिया घुसपैठ और छात्र-छात्राओं से बदसलूकी के मामले में भी इंस्टाग्राम युवाओं तक अपनी बात पहुंचाने का बेहतरीन जरिया बना है। diary_of_jamian पर आपको सैंकड़ों पोस्ट मिल जाएंगे, जिनमें स्टूडेंट्स ने दिल्ली पुलिस की बर्बरता, अपने जख्मों और अभिव्यक्ति को सुंदर पोस्टरों, वीडियो और तस्वीरों के जरिए बयां किया है।

पोस्ट के लिंक लाखों स्टूडेंट्स तक पहुंचाए गए। ग्रैजुएशन के आखिरी साल में पहुंच चुकी अंकिता (22) को चार दिन पहले ही जामिया की घटना और पुलिस की निरंकुशता के बारे में पता चला। अब वे लगातार घटनाओं को फॉलो कर रही हैं। अंकिता का कहना है कि ट्विटर पर ट्रोल ब्रिगेड की भरमार है। अधिकांश पोस्ट पर यकीन कर पाना मुश्किल है। फेसबुक पर ट्रोल्स अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हैं, तो व्हाट्सएप में फेक न्यूज की भरमार है। ऐसे में इंस्टाग्राम हकीकत से रूबरू करवाने वाला इकलौता प्लैटफॉर्म बन गया है। जामिया के विरोध प्रदर्शनों में इन लड़कियों के मन में आएशा रेना एन और लदीदा सखालूं जैसी स्टूडेंट्स की बेखौफ छवि घर कर गई है। यह पूछने पर कि क्या भारत को धर्मनिरपेक्ष और फिरकापरस्ती से आजाद करने के लिए इतना ही काफी है, इशरत कहती हैं कि सारे स्टूडेंट्स को एक होकर हॉस्टलों से बाहर किए गए स्टूडेंट्स को आसरा देने, घायलों का इलाज करवाने और गरीब बच्चों को शिक्षा के लिए मदद की कोशिश के रूप में क्राउडफंडिंग करनी चाहिए। इशरत की बातें उसे दुनिया के उन महान संतों के और नजदीक लाती हैं, जिन्होंने धर्म-जात की परवाह किए बिना केवल इंसानियत को सर्वोपरि मानकर अपना सब-कुछ कुर्बान कर दिया।

अभिव्यक्ति के लिए इंटरनेट का धड़ल्ले से इस्तेमाल करने वाली इस नई पीढ़ी की खासियत मुश्किल वक्त में कुछ अलग रास्ता खोजने की है। जब कभी छात्रों के ऊपर सरकार ने सख्ती दिखाई है, एक नया चलन और नया नेतृत्व उभरकर सामने आया है। इसे आप जेएनयू के पूर्व छात्र नेता और अब भाकपा के सदस्य कन्हैया कुमार और उनके आजादी के तराने के रूप में देख सकते हैं, वहीं आएशा और लदीदा के रूप में नए चेहरे भी सामने आने लगे हैं। अंकिता भी इस बात को मानते हुए कहती हैं कि फेसबुक और व्हाट्सएप नए आइडियाज को शेयर करने के लिए मुफीद है। ‘आप इन दोनों प्लैटफॉर्म की मदद से सूचनाओं को इंटरनेट की बदौलत तेजी से पहुंचा सकते हैं।’ सरकार को भी इस बात का पता है। लेकिन इस बार उसने बजाय सीएए के पक्ष में मिल रहे समर्थन का अपने आईटी सेल से मुकाबला करने के, इंटरनेट को ही बंद करना मुफीद माना।

भारत में इटरनेट शटडाउन पर नजर रखने वाली वेबसाइट  SFLC के अनुसार 2019 में देश में 77 बार इंटरनेट बंद किया गया है। सरकार ने 56 मौकों पर इंटरनेट सेवा कानून-व्यवस्था बिगड़ने का डर दिखाकर बंद की तो 21 बार अपनी मर्जी से। न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, कश्मीर की करीब 6 करोड जनता बीते 132 दिन से इंटरनेट सेवाओं से महरूम है। यह आबादी फ्रांस की आबादी के बराबर है। गुरुवार को जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शनों से घबराकर केंद्र सरकार ने कई जगहों पर इंटरनेट ही नहीं, मोबाइल वॉइस कॉल और एसएमएस सेवाओं को भी ठप कर दिया। उत्तरप्रदेश की स्थिति सबसे खराब है। वहां 14 शहरों में इंटरनेट सेवा बंद की गई है।

लोकेश इसे मानवाधिकार का हनन मानते हैं। उनका कहना है कि सिर्फ दुनिया में केवल चीन ही इस मामले में भारत से आगे है और लोगों का इंटरनेट हक छीनने का वह बेधड़कर स्वागत करता रहा है। लोकेश आगे यह भी दावा करते हैं कि अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद से ही बीजेपी आईटी सेल के लोगों ने व्हाट्सएप और सोशल मीडिया पर नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के रूप में मोदी सरकार के अगले मास्टर स्ट्रोक के बारे में जहर उगलना शुरू कर दिया था, साथ ही भारत में अल्पसंख्यकों के सफाए की धमकी भी खुलेआम दी जा रही थी। लेकिन सरकार इस तरह के कृत्यों को खतरा नहीं मानती। वह ऐसी अफवाह फैलाने वालों पर कोई कार्रवाई नहीं करती। लेकिन हिंसा या विरोध होने के बाद पूरे शहर या इलाके का इंटरनेट बंद कर देना एक आदत बनती जा रही है।

बात-बेबात के इंटरनेट रोकने से अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी भारत की छवि पर खासा असर पड़ा है। संयुक्त राष्ट्र संघ के स्पेशल रैपोर्तियोर और फ्रीडम ऑफ ओपिनियन एंड एक्सप्रेशन से जुड़े डेविड काये कहते हैं कि सरकार की यह कार्रवाई इस बात का साफ इशारा करती है कि वह शांतिपूर्ण विरोध को दबाना चाहती है, लोगों की आवाज को खामोश करना चाहिती है। लेकिन अमूमन इससे शांति बहाली में मदद नहीं मिल पाई है। लिहाजा बार-बार इंटरनेट बंद करने का कोई औचित्य ही नहीं है।

बहरहाल, तानाशाही के खिलाफ सड़कों पर उतरी युवा पीढ़ी को इंटरनेट बंद होने से भी खासा फर्क नहीं पड़ता। आतिशी कहती हैं, हम इसका भी मुकाबला करेंगे, रास्ता निकालेंगे। कुछ नया करेंगे। बेरोजगारी, महिलाओं के खिलाफ अपराध, देश के नामचीन शिक्षा केंद्रों पर सरकार के हमले से हलाकान नई पीढ़ी का यह जोश वाकई उम्मीद पैदा करता है।

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सौमित्र रॉय

लेखक सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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