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सरकारों के अदूरदर्शी फैसलों से बढ़ता कोरोना संकट

Apr
30 2020

रानी शर्मा

बचपन में एक कहानी पढ़ी थी अंधेर नगरी चौपट राजा, जिसकी याद इन दिनों बार-बार आने लगी है। इसकी वजह इन दिनों देश में बन रहे हालात हैं, जो हमें सोचने पर मजबूर कर रहे हैं कि ये सरकार और जिम्मेदार पदों पर बैठे सरकार के नुमाइंदे ही मनमाने निर्णय लेकर लगातार जनता की जान को जोखिम में डाल रहे हैं। कभी छात्रों को तो कभी मजदूरों को एक से दूसरे राज्य में ले जाकर कोरोना संक्रमण का खतरा बढ़ा रहे हैं।

जिन जनप्रतिनिधियों को जनता के हित की बात सोचना चाहिए वो ही राजनीति करते हुए लगातार ऐसे अवैज्ञानिक निर्णय ले रहे हैं, जिनसे जनता की जान को कोरोना का जोखिम लगातार बढ़ता ही जा रहा है। यही वजह है कि देश में कोरोना पीड़ित मरीजों की संख्या दिनों दिन बढ़ते हुए हजारों तक पहुँच गई है और यही हालात रहे तो वो दिन दूर नहीं, जब पीड़ितों की संख्या लाखों तक पहुँच जाएगी और कोरोना से होने वाली मौतें हजारों में पहुँच जाएंगी।

देश में 24 मार्च को सरकार ने बिना किसी पूर्व उचित योजना के कोरोना संकट की बात कहकर जनता को मात्र 4 घंटे का समय देकर रात 12 बजे से लॉक डाउन लागू कर दिया था, आम जनता इस तरह अचानक लागू किये गए लॉक डाउन से आश्चर्यचकित हो गई, लेकिन अधिकाँश जनता इसका पालन कर रही है. हालांकि बड़े पैमाने पर देश का मजदूर वर्ग जो रोजगार की तलाश में शहरों में रह रहा है वो इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है. सैकडों किलोमीटर की पैदल यात्रा करके सैकड़ों मजदूर शहरों से गांवों तक अपने घर पहुँचे, कई रास्ते में ही मर भी गए। हालांकि लाखों मजदूर अभी भी नारकीय जीवन देश के अलग-अलग भागों में जीने को मजबूर है क्योंकि वो कोरोना लॉक डाउन के कारण अपने घर से दूर दूसरे जिलों में फंसे हुए है और सरकार ने उनके लिए भोजन की उचित व्यवस्था नहीं की है. इस पूरी स्थिति के लिए निश्चित ही इतिहास में सरकार का नाम अदूरदर्शिता बरतने के लिए लिखा जाएगा। हालांकि मजबूरी में ही सही अपनी जान बचाने के लिए लोग जहाँ भी है वहीँ जिंदगी गुजार रहे हैं क्योंकि ये देश हित में भी जरूरी है।

खैर जिन भी परिस्थितियों में सवा माह पहले देश के प्रधानमंत्री ने लॉक डाउन लगाया था उसका पालन हर प्रदेश की सरकार को सख्ती से करवाना चाहिए था, लेकिन सिर्फ अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए ही देश में कई प्रदेशों के मुख्यमंत्री अब अपने प्रदेश की जनता को दूसरे प्रदेश से ढोकर लाने लगे है। इसकी शुरुआत उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने की. सबसे पहले वो कोटा में पढ़ रहे अपने प्रदेश के छात्रों को वापस लेकर आये, उसके बाद मध्यप्रदेश सरकार ने भी यही कदम उठाते हुए 150 बसों से कोटा से छात्रों को वापस बुला लिया।

ऐसे में जब सवाल उठा कि जो बच्चे सुरक्षित रह रहे थे उनको क्यों लाया गया लॉक डाउन के दौर में ? ऐसे में मप्र सरकार ने आगामी उपचुनाव की तैयारी करते हुए मजदूरों को भी अब वापस लाने की शुरुआत कर दी। सरकार को लग रहा है कि वो बहुत अच्छा काम कर रही है लोग पीठ थपथपायेंगे। संभव है जो लोग कोरोना नियंत्रण के लिए वैज्ञानिक सोच नहीं रखते वो यही कहेंगे कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान बहुत मजदूरों-छात्रों का ख्याल कर रहे हैं जबकि वास्तविकता ये है कि वो आम जनता की जान जोखिम में डालकर सिर्फ अपनी राजनीतिक रोटी सेंक रहे है।

अवैज्ञानिक तरीके से सोचने वाले नेताओं ने लॉकडाउन का मज़ाक बनाकर रख दिया है। इस दौर में भी बड़े पैमाने पर लोगों को एक शहर से दूसरे शहर जाने के लिए पास जारी किए जा रहे है, जिससे बड़े पैमाने पर कोरोना संक्रमण देश में फैल रहा है। उदाहरण के लिए रीवा का ही मामला ले लीजिए जो अब तक सेफ जोन था, वहां दिल्ली से एक डॉक्टर 13 अप्रैल को गए और अपनी बहन और बेटी को कोरोना संक्रमित कर आये अब इन लोगों के संपर्क में आने वाले लोगों में कोरोना संक्रमण फैलने की शुरुआत हो गई। इस तरह देश में विदेश से लौटने वाले अमीरों ने कोरोना संक्रमण फैलाया। अब देश के अंदर लॉकडाउन का मख़ौल उड़ाते हुए नेता कोरोना संक्रमण फैलाने में अपना योगदान दे रहे है।

पहली अदूरदर्शिता केंद्र सरकार ने दिखाई जिसने सिर्फ मप्र की सत्ता पाने के चक्कर में देश की चिंता नहीं की और लॉकडाउन लगाने में पहले देरी की और 23 मार्च को सत्ता हासिल करते ही अचानक लॉकडाउन लगाकर जनता को परेशानी में डाल दिया। केंद्र सरकार को लॉक डाउन लगाते समय होश नहीं था कि 4 दिन का समय जनता को अपने ठिकानों पर जाने के लिए दे देते तो देश में इतना अफरातफरी का माहौल नहीं बनता। आम गरीब इंसान परेशान नहीं होता, कई गरीब भूखे-प्यासे रास्ते में नहीं मरते।

अब जब लॉक डाउन लग ही गया तब कई प्रदेश की सरकारें लॉक डाउन का सख्ती से पालन नहीं कर रही है। अब ज़्यादातर लोगों को बड़े पैमाने पर पास जारी किए जा रहे हैं एक स्थान से दूसरे स्थान पर आवागमन के लिए। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सरकारें समझौते कर रही है एक दूसरे को उनके प्रदेश के मजदूर सौपनें के लिये। अरे अगर इतनी ही राजनीतिक रोटी सेकनें की जल्दी है तो प्रधानमंत्री जी से आग्रह करके लॉकडाउन को हटवा ही दीजिये। होने दीजिये फिर जो भी जनता को जोख़िम होता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार जब कोरोना नियंत्रण का एकमात्र उपाय ही लॉकडाउन है फिर ऐसे अवैज्ञानिक निर्णय कैसे ले पा रहे है मुख्यमंत्री ? वास्तव में नेताओं को विज्ञान का ज्ञान कराए जाने के किये विशेष रूप से प्रशिक्षित किये जाने की जरूरत है ताकि वे दिमाग का सही इस्तेमाल निर्णय लेते समय करें। जो जनता घर में रहकर कोरोना नियंत्रण में योगदान दे रही है, उनके योगदान को आवागमन के नियम लागू करके पलीता लगाया जा रहा है। वास्तव में इस देश की आम जनता कोरोना के रुप में उस जुर्म की सजा भुगत रही है, जो उसने किया ही नहीं है. अमीर लोग ये बीमारी विदेश से हवाई जहाज में बैठकर लाये और देश की सरकार इन अमीरों की एयरपोर्ट पर सही जांच और इलाज की व्यवस्था नहीं कर पाई। अब रही सही कसर विभिन्न प्रदेशों की सरकारें पूरी कर रही है जो लॉक डाउन का मज़ाक उड़ाते हुए सिर्फ वोट बैंक की खातिर सैकड़ों लोगों को एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में ला रही है और भेज रही है और जनता की जान खतरे में डाल रही है।

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रानी शर्मा

लेखिका www.kharinews.com की सम्पादक हैं.

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