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संवेदनहीन सरकार और रास्तों पर भटकता भारत-दम तोड़ती उम्मीदें, सब याद रखा जाएगा

May
12 2020

विनय द्विवेदी

24 मार्च को 4 घंटे का समय देकर कोरोना महामारी को रोकने के लिए देशबन्दी की घोषणा प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने अपने पसंदीदा समय रात्रि 8 बजे टीवी पर आकर कर दी. पूरा देश बंदीगृह में तब्दील कर दिया गया. देश में कोरोना का पहला मामला 30 जनवरी को केरल में सामने आ गया था और दुनिया भर के देशों में इसने तेजी से पैर पसारने शुरू कर दिए थे. लॉकडाउन की घोषणा और कोरोना के पहले मामले के बीच 52 दिन सरकार के पास इस महामारी से मुकाबले के लिए योजना बनाने और तेजी से उस पर अमल करने के लिए थे लेकिन केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने क्या किया? 18 घंटे बिना अवकाश के देश के लिए काम करने का दावा करने वाले हमारे प्रधानमन्त्री के पास कोरोना महामारी से लड़ने से ज्यादा महत्वपूर्ण काम शायद रहे होंगे?

इसके चार दिन बाद ही देश के गरीब मज़दूर सपरिवार अपने गाँव के लिए पैदल ही सडकों पर निकल पड़े. इस जन सैलाव में छोटे बच्चे, गर्भवती महिलायें और वृद्ध शामिल थे. पेट की भूख और परिवार की जिम्मेदारियों का बोझ हमेशा अपने ऊपर लिए चलने वाले ये गरीब सैकड़ों हजारों किलोमीटर दूर अपने घरों के लिए पैदल कैसे और क्यों निकले होंगे इसे ना तो सरकार ने समझा और ना ही प्रशासनिक तंत्र ने. जैसे ही प्रवासी मज़दूरों की तकलीफें लोगों के सामने आनी शुरू हुई वैसे ही गोदी मीडिया के झंडाबरदारों ने तब्लीगी जमात के बहाने विभाजनकारी पैंतरा खेलना शुरू कर दिया और सडकों पर से बिलखते बच्चे और गरीब ख़बरों से कई दिनों तक गायब हो गए. इसी बीच कोटा से छात्रों को वापस लाने के लिए राज्य सरकारों ने बसें भेजना शुरू किया तो प्रवासी मज़दूर फिर से खबरों में आ गए और इसके बाद कई राज्य सरकारों ने रेल और बसों से मज़दूरों को लाने के दावे शुरू कर दिए.

हजारों किलोमीटर के लम्बे रास्तों में कई प्रसव भी हुए हैं, कई मौतें भी हुई हैं. प्रसव पीड़ा और अपने किसी की मौत की तकलीफ को समझने के लिए संवेनशील होना जरुरी है. जो तस्वीरें, वीडियो और खबरे लगातार रास्तों पर भटक रहे गरीबों के आ रहे हैं उन्हें देखकर भी सरकार के माथे पर सिलबटें नहीं आ रहीं. हाँ अगर इन गरीबों की तकलीफों के विशाल चट्टानी पहाड़ों को लेकर सवाल उठा दिया जाए तो सरकार के निजी क्षेत्र के पठ्ठे तुरंत जाग उठते हैं. अब सरकार ने कहा है कि मज़दूर सडकों और रेल की पटरियों पर ना चलें. सत्ता कितनी संवेदनहीन और निरंकुश हो सकती है इसे वर्तमान दर्दनाक मंजर से समझा जा सकता है.

तक़रीबन 200 लाख करोड़ के बजट वाले देश की सरकार के पास अपने गरीब नागरिकों को मुफ्त में देने के लिए पांच रुपये का मास्क तक नहीं है. जो लोग भूखे प्यासे शहरों से गाँव की ओर के रास्तों पर भटक रहे हैं उन्हें रोटी और पानी देने लिए पैसे नहीं हैं, इन गरीबों को घर तक पहुंचाने के लिए रेल और बसें नहीं हैं. रास्तों पर भूखे प्यासे लोगों के साथ क्या क्या हो रहा है कल्पना नहीं कर सकते. बहुत से मज़दूरों के वीडियो सामने आये हैं जिनमें वो कह रहे हैं, साहब जब खाना पानी नहीं दे सकते तो हमें मारते क्यों हैं? जब काम नहीं, पैसे कौड़ी नहीं साहब बच्चे भूख से मर रहे हैं तो क्या करते गाँव को चल दिये हैं मरना तो है ही शहर में मरते या यहां रास्ते में मरें लेकिन बच गए तो गाँव पहुंच जाएंगे। साहब पैर साथ छोड़ रहे, चप्पल भी टूट गई है। सड़क बहुत तपती है पैरों की बिमाई से देखो खून आ रहा है लेकिन हिम्मत अभी बची है हो सकता है गाँव जिंदा पहुंच जाएं। बिमाई के बारे में आपको पता है या नहीं लेकिन इसकी तकलीफ को "जाके पाऊं ना जाए बिमाई वो क्या जाने पीर पराई" से समझा जा सकता है. भारत के रास्तों पर भटकते गरीब बिमाई के असहनीय दर्द के साथ अपने घरों की ओर चल रहे हैं. इंडिया वाले इसे क्रेक क्रीम के विज्ञापन से समझ सकते हैं.

महामारियां जब भी आई हैं तब तब मज़दूरों का पलायन शहरों से गाँव की हुआ है. अठारहवीं शताब्दी के अंत और उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में हमारे देश में प्लेग महामारी के दौर में भी मुंबई सहित बड़े शहरों से मज़दूरों का पलायन हुआ था. गरीब मेहनतकश पैदल ही हजारों किलोमीटर दूर अपने गाँव की ओर चल दिया था जिसमें हज़ारों लोग रास्ते में ही दम तोड़ गए थे. कोरोना महामारी के दौर में भी वही दृश्य सामने आ रहे हैं और लोग रास्ते में दम तोड़ रहे हैं. फिर सवाल ये उठता है कि आखिर बदला क्या है? बड़ा सवाल ये है कि क्या हमारे पुरखों ने अंग्रेजों से लड़ते हुए कुर्बानियां यही दिन देखने के लिए की थीं? आज तो जनता द्वारा चुनी गई जनता के लिए सरकार होनी चाहिए लेकिन ऐसा है क्या? और अगर सच यही है तो फिर सडकों पर जूझते मरते गरीबों की कराह सरकार के बहरेपन को दूर क्यों नहीं करती? प्रवासी मज़दूरों की आँखों के पानी के खारेपन को सरकार महसूस कर पा रही है?

गरीब सिर्फ वोट के समय भगवान् के रूप में याद आता है, अभी तो चुनाव नहीं हैं इसलिए उसकी बदहाली पर सिकन कैसे होगी. मैंने भोपाल में भारतीय जनता पार्टी की कई बड़ी रैलियां देखी हैं. भाजपा के दावों के हिसाब से ये रैलियां 7 से 10 लाख लोगों की भागीदारी वाली थीं. इनमें जनता अपने आप नहीं आई थी बल्कि रेल, बसों और कारों से लाई गई थी और इनके नास्ते से लेकर खाने तक के पुख्ता इंतजाम किये गए थे. देश भर में भाजपा की ऐसी सैकड़ों चुनावी रैलियां ऐसे ही इंतजामों के साथ 2014 से अब तक हुई हैं. इन रैलियों में करोड़ों लोगों ने भागीदारी की है. फिर आज अगर करोड़ों गरीब रास्तों पर भूखे प्यासे कैसे और क्यों भटक रहे हैं? ये सवाल तो बनता है.

रायपुर के पत्रकार मित्र आवेश तिवारी का फेसबुक लाइव आज ही सुबह देखा है उन्होंने रास्तों पर भटके सैकड़ों लोगों से उनके दर्द को लेकर बात की है. लेकिन जब उन्होंने प्रवासियों से पूछा कि आपने ताली-थाली बजाई थी? जबाब मिला हाँ. आपने दिए जलाये थे? जबाब मिला हाँ. आवेश तिवारी ने फिर एक सवाल और पूछा, क्या फिर से ताली बजायेंगे, दिए जलाएंगे? गरीब मजदूरों का जबाब था-नहीं. इस एक उदाहरण से भाजपा की नरेंद्र मोदी सरकार के लिए भविष्य के संकेत साफ़ साफ़ समझे जा सकते हैं. हवाई चप्पल पहनने वाले करोड़ों गरीबों को हवाई जहाज में यात्रा करवाने के हवाई जुमले देने वाले हमारे प्रधानमन्त्री तपती सडकों और रेल पटरियों पर नंगे पैर भटकते लोगों को एक-एक जोड़ी हवाई चप्पल तक उपलब्ध नहीं करा सके. हमारे देश की जनता की यादाश्त लम्बी नहीं होती, ऐसा कहा जाता है लेकिन माना तो ये भी जाता है कि मुसीबत में जो काम आता है उसे याद रखा जाता है और जो काम नहीं आता है उसे तो पुख्ता तौर पर याद रखा जाता है. हमारे देश के गरीब अपने दुःख-दर्द से सराबोर मंज़र को याद रखेंगे.

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विनय द्विवेदी

लेखक www.kharinews.com के मुख्य संपादक हैं।

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