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स्वास्थ्य नियमों में बदलाव से बढ़ेगा जनता की जान को जोखिम

May
10 2020

रानी शर्मा

देश में कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों के इलाज के लिए केंद्र सरकार ने नए नियम बनाये है, जिसके तहत केवल कोरोना के गंभीर मरीजों की ही अस्पताल से छुट्टी करते समय कोरोना निगेटिव होने की जांच की जाएगी। हल्के लक्षणों वाले पॉजिटिव मरीजों को अस्पताल से 10 दिन में बिना यह जांच किए कि वह नेगेटिव हैं या पॉजिटिव है, छुट्टी दे दी जाएगी, इस आधार पर कह सकते है कि अगर डिस्चार्ज किया गया मरीज कोरोना पॉजिटिव रह गया, तब वह अपने परिवार और आसपास सब दूर कोरोना फैलाएगा। इसका अर्थ यह हुआ कि हमारी सरकार कोरोना नियंत्रण को लेकर अब गंभीर नहीं है और आने वाले समय में देश को क्या श्मशान घाट बनाने की तैयारी कर रही है?

ये हालत तब है जबकि देश में पिछले 24 घंटे में 128 मरीजों की कोरोना से मौत हुई है और 3277 नए कोरोना पॉज़िटिव मरीजों की पहचान हुई है। देश में कोराना से अब तक 2109 मरीजों की मौत हो गई है वहीँ पॉजिटिव मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ाते हुए 62,939 हो गई है। कोरोना के हल्के लक्षणों वाले मरीजों को सरकार के अस्पताल से डिस्चार्ज करने से पहले टेस्ट ना किए जाने के निर्णय से यही लग रहा है कि यह निर्णय संभवत अस्पतालों में उपचार के लिए उपलब्ध संसाधनों की कमी के कारण लिया गया होगा। देश में जांच किट और जाँच लैब की बड़े पैमाने पर कमी है वहीँ जांच रिपोर्ट आने में कई जगह लंबा समय लग रहा है। ऐसे में रिपोर्ट आने तक मरीज को अस्पताल में रखने से सरकार के ऊपर संभवतः ज्यादा खर्च आ रहा है, यही वजह है कि स्वास्थ्य मंत्रालय ने अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ते हुए कोरोना पॉजिटिव मरीजों को हल्के लक्षण होने और 3 दिन तक बुखार न आने पर अस्पताल से 10वें दिन बिना कोरोना निगेटिव रिपोर्ट आये डिस्चार्ज करने के नियम जारी कर दिए है ।

हाल ही में देश के तमाम हिस्सों में कई मरीजों में कोरोना के लक्षण नहीं होने के बाद भी जब जांच की गई तब रिपोर्ट पॉजिटिव आई है, तब क्या सरकार अब ये मानकर चल रही है कि देश में सभी को देर-सबेर कोरोना होना ही है इस कारण ही इलाज में गंभीरता बरतने वाले नियमों को वापस ले लिया गया है। अगर सरकार देश की जनता के स्वास्थ्य के प्रति इतनी ही लापरवाह है, तो देश में 47 दिन से जारी लॉकडाउन के नाटक को बंद कर देना चाहिए ताकि देश के करोड़ों मजदूर जो इतने दिनों से परेशान होकर नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं, कम से कम अपने गांव की गलियों में भूख से या कोरोना से, जिससे भी पीड़ित होकर मरेंगे, कम से कम अपनों के बीच तो मरेंगे। हाल ही में कहीं ट्रेन से तो कहीं ट्रक से कटकर या दबकर मजदूरों के मरने और घायल होने की घटनाएं आये दिन सामने आ ही रही हैं। लॉकडाउन के कारण लाखों मजदूर पिछले 47 दिन से देश में यहां वहां पैदल ही जा रहे हैं । कोरोना लॉकडाउन का नाटक बन्द करके सभी ट्रेनों को सामान्य तरीके से देश में चला दिया जाना चाहिए ताकि मजदूरों की परेशानियां कुछ तो कम हो जाती।

देश का वह मजदूर जिसने इस देश को बनाया आज देश जिस रूप में नजर आ रहा है, वह सिर्फ और सिर्फ मजदूरों की मेहनत के बिना संभव नहीं था । हर इमारत की हर योजना की जड़ में मजदूर का ही पसीना देखने पर नजर आएगा, लेकिन इस देश का दुर्भाग्य है कि सरकार मजदूरों के प्रति घोर असंवेदनशीलता 47 दिन से बरत रही है. बिना उचित योजना के लॉकडाउन किए जाने का नतीजा एक तरह से देश का हर नागरिक भुगत रहा है। करोड़ों रुपए का आर्थिक नुकसान इस देश की जनता को बिना योजना के लॉकडाउन किए जाने से हुआ है।

ऐसे में डेढ़ माह तक लॉक डाउन की पीड़ा भोगने के बाद जब सरकार कोरोना पॉजिटिव मरीजों के इलाज नियमों में बदलाव कर रही है, तब स्पष्ट हो गया है कि यह सरकार ना सिर्फ मजदूरों के प्रति घोर असंवेदनशील है बल्कि इस देश की 130 करोड़ जनता के प्रति भी असंवेदनशील है। कोरोना वायरस के हल्के लक्षणों के मरीजों की बिना अंतिम जांच रिपोर्ट निगेटिव आये हुए अस्पताल से छुट्टी किये जाने का मतलब न सिर्फ मरीज के जीवन को खतरा होगा बल्कि उसके परिवार और समाज के लिए भी कोरोना का खतरा होगा। शायद सरकार यही मानकर चल रही है कि भारत देश के लोग इसी बदहाली में कीड़े-मकोडों की तरह मरने के लिए पैदा हुए हैं ।

याद कीजिये ये वही सरकार है जिसके मुखिया देश की 130 करोड़ जनता को अपना परिवार मानते है और उन चौकीदार की एक आवाज पर जनता वही करने लगती है जो वो कहते है, फिर भी सरकार की संवेदनशीलता इस देश की जनता के प्रति नहीं है। जनता को उनके हाल पर छोड़ने की भावना ही सरकार के चिकित्सा नियमों में किए गए बदलाव से नजर आ रही है। जनता को समझना होगा और अपने समाज की चिंता करते हुए आवाज भी उठानी होगी कि आखिरकार उनकी जान की कीमत सरकार के लिए क्या कुछ भी नहीं है ?

यह वही सरकार है जो देश में 130 करोड़ जनता की नागरिकता साबित करने के लिए करोड़ों रुपए खर्च करने वाली थी। क्या वही राशि आज देश के नागरिकों की जान बचाने के लिए अच्छी से अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं जुटाने के लिए खर्च नहीं की जानी चाहिए ? आखिरकार सरकार की लापरवाही के कारण ही तो देश में करोना संक्रमण फैला है । अगर समय से एयरपोर्ट पर विदेशों से आने वाली फ्लाइट से लौटने वाले सैकड़ों नागरिकों की जांच करके उन्हें क्वारंटीन कर दिया जाता तो आज इस देश के नागरिक बिना गलती की सजा अपने घरों में बैठकर नहीं भोग रहे होते। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी है कि कोरोना मरीजों के इलाज के लिए मनमाने नियम बनाकर जनता की जान से खिलवाड़ न किया जाय।

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रानी शर्मा

लेखिका www.kharinews.com की सम्पादक हैं.

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