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और उन्होंने खोज लिया "अवसर" बन रहे हैं "आत्मनिर्भर"!!!

May
17 2020

अरुण दीक्षित

दोपहर में भोजन करने के बाद आराम करने का मूड बना ही रहा था कि फोन सरसराने लगा। दरअसल आराम में खलल न पड़े इसलिये मैंने उसकी घण्टी बंद कर दी थी। देखा तो मुसद्दी भइया याद कर रहे हैं। फोन के स्क्रीन पर उंगली घुमाते हुए उसे स्पीकर मोड पर किया! साथ ही भइया को पालागन दाग दिया।आपको पता है आजकल भइया नए नए आशीर्वाद दे रहे हैं। शायद कोरोना काल का असर है। समय का लाभ लेते हुए भइया नए नए आशीर्वाद खोज रहे हैं। पालागन के उत्तर में भइया ने हंसते हुए कहा-जीवन में नए अवसर मिलें और खूब आत्मनिर्भर बनो। मैं उनके नए आशीर्वाद का अर्थ पूछ पाता उससे पहले ही वह आगे बढ़ गए!

भइया बोले-लल्ला एक बात है! अपने प्रधानसेवक जी की बात कोई और समझे न समझे पर सरकारी कर्मचारी और अधिकारी उनके कहन से पहले ही समझ जात हैं। वे तत्काल अमल भी करन लगत हैं। अब तीन दिन पहले प्रधानसेवक जी ने कही कि कोरोना एक अवसर है। इसके जरिये हमें आत्मनिर्भर बनना है।
उन्हें जे पतो ही नहीं कि सरकारी कर्मचारी तो पहले ही कोरोना को अवसर में बदल चुके हैं। लॉक डाउन और बढ़ा तो वे खुद तो हैं ही अपनी अगली पीढ़ी को भी आत्मनिर्भर बना देंगे।

मैंने मुसद्दी भइया की बात काटते हुये उनसे पूछा कि भइया अचानक क्या हुआ! सरकारी कर्मचारियों ने कोरोना में ऐसा कौन सा अवसर खोज लिया जिससे वे अपनी अगली पीढ़ी को भी आत्मनिर्भर बना देंगे। इस पर भइया जोर से हंसे फिर बोले-दिल्ली से लेकर सुदूर गांव तक "अवसर" और "आत्मनिर्भर" का खेल चल रहा है। दिल्ली में बैठे अफसरों ने तो पीपीई किट खरीदने में ही "अवसर" ढूंढ लिया ! मास्क, दस्ताने, सेनिटाइजर, दबा और अन्य साज सामान की खरीद तो "आत्मनिर्भरता" का सुगम मार्ग बन ही चुकी है। इनकी मनमानी कीमत तो हम दे ही रहे हैं। सुना है कि निजी अस्पताल भी "अवसर और आत्मनिर्भरता" का शानदार साधन बने हैं। अब यह अवसर जिलों और गांवों में भी पहुंच चुके हैं।अपने उन्नाव बारे तिरवेदी दद्दा बता रहे थे कि आजकल बाहर से लौट रहे लोगों को तन्हाई (क्वारन्टीन)में रखने की व्यवस्था और खाने पीने के सामान का वितरण भी अवसर और आत्मनिर्भरता का जरिया बन गया है।

दद्दा बता रहे थे कि जो लोग बाहर से आ रहे हैं उन्हें 14 दिन तन्हाई में रखने का सरकारी आदेश है। इस पर होने बाला ख़र्चा सरकारी खजाने से ही आता है।अब हर गांव में तन्हाई केंद्र बने हैं। इनकी व्यवस्था संभाल रहे सरकारी कारकून दो तीन दिन में ही लोगों को घर भेज देते हैं। लेकिन उनके नाम पर खर्चे की रसीद पूरे 14 दिन की कटती है। तो बताओ कि हो गया न अवसर आत्मनिर्भर बनने का।इस अवसर में नीचे से ऊपर तक आत्मनिर्भरता आ रही है।

तिरवेदी दद्दा तो जे भी बता रहे हैं कि सरकारी कारकूनों ने एक और अवसर खोज लिया है।वे गरीबों को दी जाने बाली खाद्य सामग्री को भी आत्मनिर्भरता जरिया बना रहे हैं। गरीब जरूरतमंद के साथ फोटो खिंचाते समय उसके हाथ में 25 किलो का थैला पकड़ाते हैं। लेकिन बाद में उसे 10 किलो सामान बाला थैला पकड़ा देते हैं। ऐसे न जाने कितने अवसर खोज लिए गए हैं।

संकटकाल है। इनके बारे में न कोई सवाल कर सकता है और न कोई जांच होगी। पीएम केयर्स फंड से लेकर डीएम केयर्स फंड तक अवसर ही अवसर हैं। न जाने कितने लोग आत्मनिर्भर बन जाएंगे। गांव में नरेगा योजना भी इसी का जरिया बनी हुई है।

अब तुम लोग कुछ भी कहो अपने प्रधानसेवक बिना सोचे समझे कुछ नही कहते! आखिर गुजराती जो ठहरे! व्यापार उनके खून में है।

तिरवेदी दद्दा तो जहो पूछ रए ते कि जरा जे पता करना कि कोरोना किट कौन कौन कम्पनी बना रही है। देश भी तो जाने कि कोरोना ने किसे किसे "अवसर" दिया और किसे किसे "आत्मनिर्भर" बनाया। पता चल जाये तो हमें भी बता देना। यह कह कर भइया ने फोन काट दिया। अगर आप बता सको कि अवसर और आत्मनिर्भर की गंगा में कौन कौन तैर रहा है। तो बताना जरूर।

मुसद्दी भइया को बताना है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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