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मप्र में टेरर फंडिंग के संदिग्ध विशेष एप के जरिए भेजते थे संदेश

Aug
23 2019

भोपाल, 23 अगस्त (आईएएनएस)। मध्यप्रदेश में पाकिस्तान के लिए जासूसी और आतंकी फंड जुटाने वाले सूचना प्रौद्योगिकी के जानकार भी हैं। यही कारण है कि वे एक विशेष एप का उपयोग करते थे। यह एक ऐसा मैसेंजर है, जिसके संदेशों को पुलिस के लिए खंगालना आसान नहीं है, क्योंकि इन संदेशों का कहीं भी कोई रिकार्ड उपलब्ध नहीं होता।

आतंकवाद रोधी दस्ते (एटीएस) ने बुधवार शाम सतना जिले में पांच लोगों को हिरासत में लिया था। बाद में तीन लोगों (बलराम सिंह, सुनील सिंह, शुभम तिवारी) को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें भोपाल लाया गया है। वहीं दो अन्य अब भी सतना में हिरासत में हैं, जिनसे पूछताछ जारी है। इन सभी पर आरोप है कि ये सीमा पार आतंकवादियों के लिए भारत से धन जुटाकर पाकिस्तान भेजने का काम किया करते थे। इनके पास से पाकिस्तान के कई नंबरों पर संपर्क, डेटा भेजने और पैसे के लेन-देन का ब्यौरा पुलिस के हाथ लगा है।

पुलिस सूत्रों के अनुसार, ये लोग पाकिस्तान में बैठे लोगों के साथ वीडियो कॉल, व्हाट्सएप के साथ ही एक विशेष मैसेंजर एप के जरिए बातचीत करते थे। जांच एजेंसी वीडियो कॉल, व्हाट्सएप का तो रिकार्ड रिकवर कर सकती है, मगर उस विशेष एप के संदेशों का ब्यौरा हासिल करना उसके लिए आसान नहीं है।

रीवा परिक्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक(आईजी) चंचल शेखर ने आईएएनएस को बताया, "ये लोग अपने संदेशों को दूसरे तक पहुंचाने के लिए एक विशेष मैसेंजर एप का उपयोग करते थे। यह ऐसा मैसेंजर है, जिसमें एक व्यक्ति अपने मोबाइल पर संदेश टाइप करता है, और दूसरा उसे उसी वक्त पढ़ सकता है, लिहाजा संदेश को भेजने की जरूरत नहीं होती।"

सूचना प्रौद्योगिकी के जानकारों का मानना है कि इस तरह के मैसंेजर एप का उपयोग शातिर किस्म के अपराधी करते हैं। क्योंकि जब कोई संदेश भेजा ही नहीं जाएगा तो उसे रिकवर करना संभव नहीं है। इस तरह पाकिस्तान के लिए जासूसी करने वाले और टेरर फंड जुटाने के काम में लगे युवकों का इस मैसेंजर का उपयोग करना यह साबित करता है कि वे सामान्य किस्म के अपराधी नहीं हैं। उन्हें इस बात की जानकारी है कि किस मैसेंजर या सोशल साइट का उपयोग करना चाहिए।

साइबर एक्सपर्ट और व्यापमं मामले के व्हिसलब्लोअर प्रशांत पांडे ने इस खास एप के बारे में आईएएनएस को बताया, "थर्ड पार्टी एप्लीकेशंस होते हैं, जिसके जरिए किसी भी एक्टिविटीज को रिलीज किया जा सकता है। थर्ड पार्टी एप्लीकेशंस हालांकि इमो के स्पेसिफिक फीचर नहीं होते, लेकिन वे उसमें हेल्पफुल होते हैं। इमो ठीक वैसा ही है, जैसा कि कंप्यूटर में टीम व्यूवर होता है। टीम व्यूवर में एक कंप्यूटर पर काम करते हुए दूसरे कंप्यूटर पर उस काम को देखा जा सकता है।"

पुलिस को जांच में पता चला है कि आरोपियों द्वारा संगठित होकर पाकिस्तानी एजेन्टों को बैंक अकाउंट तथा एटीएम कार्ड की जानकारियां तथा धनराशियां भेजी गई हैं। पकड़े गए आरोपी पूर्व में भी योजनाबद्ध तरीके से युद्ध की स्थिति में सामरिक जानकारियां एकत्रित कर भेजने के मामले में पकड़े जा चुके हैं। सुनील सिंह, बलराम सिंह, शुभम मिश्रा और उनके साथी पाकिस्तान के उन्हीं हैंडलर से पुन: संपर्क में आकर काम कर रहे थे, जो भारत के विरुद्ध पूर्व में काम कर रहे थे।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2017 में मध्यप्रदेश एटीएस द्वारा एक प्रकरण दर्ज कर बलराम, ध्रुव सक्सेना सहित 15 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था। यह पूरा गिरोह पाकिस्तान के हैंडलेरों के निर्देशों पर फर्जी बैंक खाते खुलवाकर उनमें धनराशि प्राप्त कर रहा था और उसे ठिकाने लगा रहा था। इस काम में अवैध टेलीफोन एक्सचेंज भी स्थापित किए गए थे। साथ ही पाकिस्तानी हैंडलरों से इंटरनेट कालिंग के जरिए बातचीत होती थी। पाकिस्तान के हैंडलरों द्वारा 100 से अधिक कान्टैक्ट नम्बरों से संपर्क किया जा रहा था।

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