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मृत समाज का शोकगीत: आर्टिकल 15

Jul
09 2019

सुरेश तोमर

जाति हमारे समाज में आदमी का भविष्य तय कर देती है। आपको पता होता कि दुर्भाग्य कहाँ तक आपका पीछा करेगा। शोषण और अपमान की किन अतल गहराइयों को छूना है।

दिनकर द्वारा रचित "रश्मिरथी" में एक प्रसंग है जिसमें रंगशाला में सूतपुत्र कर्ण अर्जुन को द्वंद्व युद्ध के लिए चुनौती देता है। तब कृपाचार्य इस द्वंद्व को बचाने के लिए कर्ण से प्रश्न करते हैं -

अर्जुन से लड़ना है तो मत रहो सभा में मौन,
नाम धाम कुछ कहो, बताओ तुम जाति हो कौन।

उत्तर में कर्ण कहता है-

ऊपर सिर पर कनक छत्र , भीतर काले के काले,
शरमाते हैं नहीं जगत में जाति पूछने वाले।

पाते हैं सम्मान तपोबल से भूतल पर शूर,
जाति जाति का शोर मचाते केवल कायर क्रूर।

मनुस्मृति से संचालित होने वाले इस समाज में महाभारत काल से अब तक कुछ नहीं बदला है। मृत्युतुल्य अपमान दलितों के जीवन का हिस्सा तब भी था और आज भी है। आर्टिक्ल 15 इसी का प्रामाणिक दस्तावेज है। कहानी और उसका प्रस्तुतिकरण इतना intense है कि हमें अपनी निरर्थकता का अहसास होने लगता, महसूस होता है कि अगर हम इसे बदल नहीं सकते तो हमें मर जाना चाहिए।

शोषण एक निरन्तर प्रक्रिया है, अगर कोई सर उठाएगा तो उसे कुचल दिया जाएगा। अगर प्रतिरोध करने वाली स्त्री है तो उसकी अस्मिता को कुचलने का सबसे आसान उपाय दबंगों के पास है 'बलात्कार'। बलात्कार से किसी पुरुष की sexual desire पूरी नहीं होती, ये तो बदला लेने का, सर उठाने वाली औरत को उसकी औकात दिखाने का हथियार है। यहां मात्र 3 रुपये मजदूरी बढ़ाने की मांग को प्रतिरोध मान लिया जाता है और सजा दी जाती है सामूहिक बालात्कार, जिसमें वे भी शामिल होते हैं, जो कानून के रक्षक है।

दलित अपनी स्त्रियों के साथ हुए यौन अपराध को लेकर इतने अभ्यस्त हो चके हैं कि उस बेटी का पिता पुलिस वाले से कहता है कि वे चाहते तो लड़कियों को एक दो दिन अपने पास रखते पर मारने की क्या जरूरत थी। वो पुलिसवाला भी बाद में उस अपराधी से कहता है कि साले, तुम्हें जो करना था कर लेते, मारे काहे को। गोयाकि बलात्कार अपने आप मे कोई अपराध है ही नहीं। ये अपराध का सिरहन पैदा कर देने वाला सामान्यीकरण है।

फ़िल्म में जब नायक एक युवा दलित क्रांतिकारी से कहता है कि देश तो संविधान के अनुसार ही चलेगा तो कानों को सुनने में अच्छा तो लगता है पर परिस्थितियां देखकर विश्वास नहीं होता है।

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